श्रद्धया क्रियते तत श्राद्ध
श्रद्धासे पितरो का आवाहन करके
विधिवत हविषयुक्त पिंड प्रदान आदि कर्म करना ही श्राद्ध है | पितरोको
उद्देशित किये श्राद्ध को पितृयज्ञ संज्ञा है | पितरही अपने कुलकी रक्षा
करते है इसलिये श्राद्धादि करमसे उन्हे संतुष्ट करना चाहिये | पितर फिर
पितृलोक के हो या प्रेतपुरिके हो, वे वायुरूपसे अपना हविरभाव लेने के लिये
जरूर आते है | जो श्राद्धद्वारा पितरोको संतुष्ट करते है उन्हे पितरोका
आशीर्वाद प्राप्त होता है जैसे आयुष्य, कीर्ति, बल तेज, धन, पुत्र, पशु,
स्त्री और आरोग्य पर ये सब पितर संतुष्ट होनेसेही उनके पुत्रादियो को
प्राप्त कर देते है | यदि श्राद्ध न किया जय तो वे शरीरके खून को चूसते है |
और वो पितृलोकमे या प्रेतलोकमे जाते वक्त दारुण शाप देते है | इसेही पितृशअप कहते है | इसलिये श्राद्ध करना जरूरी है | श्राद्ध कर्म न करनेसे पितरोको प्रेतत्व प्राप्त होता है |
श्राद्ध के प्रकार - और्ध्वदेहिक, सांवत्सरिक, एकोदिष्ट पार्वण, तीर्थश्राद्ध, काम्यश्राद्ध | काम्यश्राद्ध विशेष अभिलाषाकी पूर्ति के लिये किये जानेवाले श्राद्धको काम्यश्राद्ध कहते है |
त्रिपिंडी श्राद्ध
कभी कभी श्राद्ध
करनेकी इच्छा होते हुए भी श्राद्ध नहीं कर सकते और श्राद्ध कर्मका लोप
होता है | यदि लगातार तीन साल पितरोका श्राद्ध न होनेसे पितरोको प्रेतत्व
आता है | यह दोष दूर करने के लिये त्रिपिंडी श्राद्ध करना चाहिये | पितरोको
प्रेतत्व आनेसे उस घर मे अशांतता निर्माण होती है | घर मे शुभ कार्य होता
नहीं | व्यवसायोमे असफलता आती है | मृत व्यक्ति स्वप्न मे आते है | समृद्धि
दिन ब दिन ढलती जाती है | घर मे अनिष्ट शक्तियोका वास होता है | इसलिये
त्रिपिंडी श्राद्ध करना चाहिये (श्लोक) इस श्लोकवचन के अनुसार त्रिपिंडी
श्राद्ध विधि त्र्यंबकेश्वर मे ही करना चाहिये | ये एक काम्यश्राद्ध है | मानव
का एक मास पितरोका एक दिन होता है | अमावस पितरो की तिथि है | इसलिये
अमावस के दिन त्रिपिंडी श्राद्ध करने का महत्व सबसे अधिक है | यह एक दिन मे
संपन्न होनेवाली पूजा है | इस मे ब्रम्हा, विष्णु, रुद्र ये प्रमुख देवता
है | ये दिविस्थ, अन्तरिज, भूमिस्थ और सत्व, रज, तमोगुणी तथा बाल, तरुण और
वृद्ध अवस्था के अनादिष्ट प्रेत को सदगति देते है |
अवर्नियो महिमा त्रिपिंडी श्राद्ध कर्मणः |
अतः सर्वेषु कालेषु त्र्यंबकन्तु विशिष्यते ||
इसवचन के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध विधि त्र्यंबकेश्वर मे ही करना चाहिये |
एकोद्दिष्ट विधानेंन एक तन्त्रेण त्दभ्वेत |
पिशाच्चमोचनतीर्थ कुशावर्ते विशेषतः ||

